रख दी है उस ने खोल के ख़ुद जिस्म की किताब
सादा वरक़ पे ले कोई मंज़र उतार दे
प्रेम कुमार नज़र
उसी के ज़िक्र से हम शहर में हुए बदनाम
वो एक शख़्स कि जिस से हमारी बोल न चाल
प्रेम कुमार नज़र
आख़िर उस की सूखी लकड़ी एक चिता के काम आई
हरे-भरे क़िस्से सुनते थे जिस पीपल के बारे में
प्रेम वारबर्टनी
कभी खोले तो कभी ज़ुल्फ़ को बिखराए है
ज़िंदगी शाम है और शाम ढली जाए है
प्रेम वारबर्टनी
तुम ने लिक्खा है मिरे ख़त मुझे वापस कर दो
डर गईं हुस्न-ए-दिला-आवेज़ की रुस्वाई से
प्रेम वारबर्टनी
मेरी तन्हाई की पगडंडी पर
मेरे हम-राह ख़ुदा रहता है
प्रीतपाल सिंह बेताब
चलते चलते अक्सर रुक कर सोचा भी
क्या मंज़िल पर याद रहेगा रस्ता भी
पूजा भाटिया

