मअ'नी-ए-रौशन जो हों तो सौ से बेहतर एक शेर
मतला-ए-ख़ुर्शीद काफ़ी है पए-दीवान-ए-सुब्ह
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
मकान सीने का पाता हूँ दम-ब-दम ख़ाली
नज़र बचा के तू ऐ दिल किधर को जाता है
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
समझा है हक़ को अपने ही जानिब हर एक शख़्स
ये चाँद उस के साथ चला जो जिधर गया
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
सुब्ह-दम ग़ाएब हुए 'अंजुम' तो साबित हो गया
ख़ंदा-ए-बेहूदा पर तोड़े गए दंदान-ए-सुब्ह
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
अपने जुनूँ-कदे से निकलता ही अब नहीं
साक़ी जो मय-फ़रोश सर-ए-रहगुज़ार था
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
बुराई भलाई की सूरत हुई
मोहब्बत में सब कुछ रवा हो गया
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
छू ले सबा जो आ के मिरे गुल-बदन के पाँव
क़ाएम न हों चमन में नसीम-ए-चमन के पाँव
पंडित जवाहर नाथ साक़ी

