किया है चश्म-ए-मुरव्वत ने आज माइल-ए-मेहर
मैं उन की बज़्म से कल आबदीदा आया था
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
महव-ए-लिक़ा जो हैं मलकूती-ख़िसाल हैं
बेदार हो के भी नज़र आते हैं ख़्वाब में
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
मेरी क़िस्मत की कजी का अक्स है
ये जो बरहम गेसू-ए-पुर-ख़म रहा
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
नफ़्स-ए-मतलब ही मिरा फ़ौत हुआ जाता है
जान-ए-जानाँ ये मुनासिब नहीं घबरा देना
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
नहीं खुलता सबब तबस्सुम का
आज क्या कोई बोसा देंगे आप
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
नैरंग-ए-इश्क़ आज तो हो जाए कुछ मदद
पुर-फ़न को हम करें मुतहय्यर किसी तरह
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
निगह-ए-नाज़ से इस चुस्त क़बा ने देखा
शौक़ बेताब गुल-ए-चाक-ए-गरेबाँ समझा
पंडित जवाहर नाथ साक़ी

