किस क़दर हिज्र में बेहोशी है
जागना भी है हमारा सोना
निज़ाम रामपुरी
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कू-ए-जानाँ में गर अब जाएँ भी तो क्या देखें
कोई रौज़न न रहा बन गई दीवार नई
निज़ाम रामपुरी
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क्या दुआ रोज़-ए-हश्र की माँगें
वहाँ पर भी यही ख़ुदा होगा
निज़ाम रामपुरी
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क्या किसी से किसी का हाल कहें
नाम भी तो लिया नहीं जाता
निज़ाम रामपुरी
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लिपटा के शब-ए-वस्ल वो उस शोख़ का कहना
कुछ और हवस इस से ज़ियादा तो नहीं है
निज़ाम रामपुरी
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मैं न कहता था कि बहकाएँगे तुम को दुश्मन
तुम ने किस वास्ते आना मिरे घर छोड़ दिया
निज़ाम रामपुरी
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मंज़ूर क्या है ये भी तो खुलता नहीं सबब
मिलता तो है वो हम से मगर कुछ रुका हुआ
निज़ाम रामपुरी
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