बे-साख़्ता निगाहें जो आपस में मिल गईं
क्या मुँह पर उस ने रख लिए आँखें चुरा के हाथ
निज़ाम रामपुरी
बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है
गालियाँ भी मिलीं हम को तो मिलीं थोड़ी सी
निज़ाम रामपुरी
छेड़ हर वक़्त की नहीं जाती
रोज़ का रूठना नहीं जाता
निज़ाम रामपुरी
दरबाँ से आप कहते थे कुछ मेरे बाब में
सुनता था मैं भी पास ही दर के खड़ा हुआ
निज़ाम रामपुरी
देख कर ग़ैर को शोख़ी देखो
मुझ से कहते हैं कि देखा तू ने
निज़ाम रामपुरी
देना वो उस का साग़र-ए-मय याद है 'निज़ाम'
मुँह फेर कर इधर को उधर को बढ़ा के हाथ
निज़ाम रामपुरी
दो दिन भी उस सनम से न अपनी निभी कभी
जब कुछ बनी तो फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा से बिगड़ गई
निज़ाम रामपुरी

