अब किस को याँ बुलाएँ किस की तलब करें हम
आँखों में राह निकली दिल में मक़ाम निकला
निज़ाम रामपुरी
अब क्या मिलें किसी से कहाँ जाएँ हम 'निज़ाम'
हम वो नहीं रहे वो मोहब्बत नहीं रही
निज़ाम रामपुरी
अब तो सब का तिरे कूचे ही में मस्कन ठहरा
यही आबाद है दुनिया में ज़मीं थोड़ी सी
निज़ाम रामपुरी
अब तुम से क्या किसी से शिकायत नहीं मुझे
तुम क्या बदल गए कि ज़माना बदल गया
निज़ाम रामपुरी
अभी तो कहा ही नहीं मैं ने कुछ
अभी तुम जो आँखें चुराने लगे
निज़ाम रामपुरी
अपनी अंदाज़ के कह शेर न कह ये तू 'निज़ाम'
कि चुनाँ बैठ गया और चुनीं बैठ गई
निज़ाम रामपुरी
बहर-ए-हस्ती से कूच है दरपेश
याद मंसूबा-ए-हुबाब रहे
निज़ाम रामपुरी

