सुन ऐ कोह-ओ-दमन को सब्ज़ ख़िलअत बख़्शने वाले
नहीं मिलता तिरे दर से ग़रीबों को कफ़न अब तक
निसार इटावी
तू ने वो सोज़ दिया है कि इलाही तौबा
ज़िंदगी आग के शोलों में बसर होती है
निसार इटावी
वो दिन गुज़रे कि जब ये ज़िंदगानी इक कहानी थी
मुझे अब हर कहानी ज़िंदगी मालूम होती है
निसार इटावी
यक़ीनन रहबर-ए-मंज़िल कहीं पर रास्ता भूला
वगर्ना क़ाफ़िले के क़ाफ़िले गुम हो नहीं सकते
निसार इटावी
ये भी हुआ कि दर न तिरा कर सके तलाश
ये भी हुआ कि हम तिरे दर से गुज़र गए
निसार इटावी
ये दिल वालों से पूछो इस को दिल वाले समझते हैं
बिगाड़ आई हवा ज़ुल्फ़ें किसी की या सँवार आई
निसार इटावी
ब-ज़ाहिर दश्त की जानिब तो बढ़ता जा रहा है
मगर सब रास्ते भी याद करता जा रहा है
निशांत श्रीवास्तव नायाब

