तिरे वजूद को छू ले तो फिर मुकम्मल हो
भटक रही है ख़ुशी कब से दर-ब-दर मुझ में
नीना सहर
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ज़ख़्म भी अब हसीन लगते हैं
तेरे हाथों फ़रेब खाने पर
नीना सहर
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अजब ये दौर आया है कि जिस में
ग़लत कुछ भी नहीं सब कुछ सही है
नीरज गोस्वामी
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डाल दीं भूके को जिस में रोटियाँ
वह समझ पूजा की थाली हो गई
नीरज गोस्वामी
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गर न समझा तो 'नीरज' लगेगी कठिन
ज़िंदगी को जो समझा तो आसान है
नीरज गोस्वामी
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घुटन तड़पन उदासी अश्क रुस्वाई अकेला-पन
बग़ैर इन के अधूरी इश्क़ की हर इक कहानी है
नीरज गोस्वामी
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है जिन के बाज़ुओं में दम वो दरिया पार कर लेंगे
बहुत मुमकिन है डूबें वो जो बैठे हैं सफ़ीने में
नीरज गोस्वामी
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