तुम्हें हमारी मोहब्बतों के हसीन जज़्बे बुला रहे हैं
जो हम ने लिक्खे थे तुम पे हमदम वो सारे नग़्मे बुला रहे हैं
नदीम गुल्लानी
तू समझता है गर फ़ुज़ूल मुझे
कर के हिम्मत ज़रा सा भूल मुझे
नदीम गुल्लानी
उम्र भर रहना है ताबीर से गर दूर तुम्हें
फिर मिरे ख़्वाब में आने की ज़रूरत क्या है
नदीम गुल्लानी
इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले
ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले
नादिम नदीम
क्या शिकायत जो कट गए गाहक
माल ही जब दुकान में न रहा
नादिर काकोरवी
चलती तो है पर शोख़ी-ए-रफ़्तार कहाँ है
तलवार में पाज़ेब की झंकार कहाँ है
नादिर लखनवी
दरिया-ए-शराब उस ने बहाया है हमेशा
साक़ी से जो कश्ती के तलबगार हुए हैं
नादिर लखनवी

