छूटे हैं ऐसे बार-ए-सफ़र से तमाम लोग
जैसे किसी के दोश पे सर भी नहीं रहा
मोहम्मद ख़ालिद
हाँ मैं शिकस्ता-दिल हूँ मगर आइना तो हूँ
तू अपना रंग देख मिरे हाल पर न जा
मोहम्मद ख़ालिद
कफ़-ए-सैय्याद दाम-ए-ख़ुश-नुमा ज़ंजीर ओ ज़िंदाँ तक
असीरी उम्र की होगी मगर तरतीब से होगी
मोहम्मद ख़ालिद
कौन सुनता है हवाओं की अजब सरगोशियाँ
और जाती हैं हवाएँ दर-ब-दर किस के लिए
मोहम्मद ख़ालिद
पहले सब आवाज़ें इक शोर में ढलती हैं
फिर कोई नग़्मा कानों में रस घोलता है
मोहम्मद ख़ालिद
ये क़िस्सा-ए-जाँ यूँ ही मशहूर नहीं होता
लाज़िम तो हमारा था मलज़ूम तुम्हारा है
मोहम्मद ख़ालिद
दिलों से दर्द दुआ से असर निकलता है
ये किस बहिश्त की जानिब बशर निकलता है
मोहम्मद मुख़तार अली

