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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

न काबा ही तजल्ली-गाह ठहराया न बुत-ख़ाना
लड़ाना ख़ूब आता है तुम्हें शैख़ ओ बरहमन को

मिर्ज़ा मायल देहलवी




तल्ख़ी तुम्हारे वाज़ में है वाइज़ो मगर
देखो तो किस मज़े की है तल्ख़ी शराब में

मिर्ज़ा मायल देहलवी




तौबा के टूटते का है 'माइल' मलाल क्यूँ
ऐसी तो होती रहती है अक्सर शबाब में

मिर्ज़ा मायल देहलवी




तुम्हें समझाएँ तो क्या हम कि शैख़-ए-वक़्त हो माइल
तुम अपने आप को देखो और इक तिफ़्ल-ए-बरहमन को

मिर्ज़ा मायल देहलवी




आश्ना कोई नज़र आता नहीं याँ ऐ 'हवस'
किस को मैं अपना अनीस-ए-कुंज-ए-तन्हाई करूँ

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




ऐ आफ़्ताब हादी-ए-कू-ए-निगार हो
आए भला कभी तो हमारे भी काम दिन

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस




देखें क्या अब के असीरी हमें दिखलाती है
लोग कहते हैं कि फिर फ़स्ल-ए-बहार आती है

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस