तेरे बाज़ार-ए-दहर में गर्दूं
हम भी आए हैं इक क़बा के लिए
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
तोहमत-ए-जुर्म-ओ-ख़ता हिर्स-ओ-हवा ग़फ़लत-ए-दिल
हम ने बाज़ार से हस्ती के लिया क्या क्या कुछ
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
तुफ़ैल-ए-रूह मिरा जिस्म-ए-ज़ार बाक़ी है
हुआ के दम से ये मुश्त-ए-ग़ुबार बाक़ी है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
उमीद है हमें फ़र्दा हो या पस-ए-फ़र्दा
ज़रूर होएगी सोहबत वो यार बाक़ी है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
उस बुत को छोड़ कर हरम-ओ-दैर पर मिटे
अक़्ल-ए-शरीफ़ से ये निहायत बईद है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
यूँ इंतिज़ार-ए-यार में हम उम्र भर रहे
जैसे नज़र ग़रीब की अल्लाह पर रहे
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
अज़मत-ए-कअबा मुसल्लम है मगर बुत-कदा में
एक आराम ये कैसा है कि कुछ दूर नहीं
मिर्ज़ा मायल देहलवी

