दिल्ली छुटी थी पहले अब लखनऊ भी छोड़ें
दो शहर थे ये अपने दोनों तबाह निकले
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
दुबकी हुई थी गुरबा-सिफ़त ख़्वाहिश-ए-गुनाह
चुमकारने से फूल गई शेर हो गई
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
हँस के कहता है मुसव्विर से वो ग़ारत-गर-ए-होश
जैसी सूरत है मिरी वैसी ही तस्वीर भी हो
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
है यक़ीं वो न आएँगे फिर भी
कब निगह सू-ए-दर नहीं होती
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
हम को भी क्या क्या मज़े की दास्तानें याद थीं
लेकिन अब तमहीद-ए-ज़िक्र-ए-दर्द-ओ-मातम हो गईं
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
हम-नशीं देखी नहूसत दास्तान-ए-हिज्र की
सोहबतें जमने न पाई थीं कि बरहम हो गईं
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
किस क़दर मो'तक़िद-ए-हुस्न-ए-मुकाफ़ात हूँ मैं
दिल में ख़ुश होता हूँ जब रंज सिवा होता है
मिर्ज़ा हादी रुस्वा

