है दौलत-ए-हुस्न पास तेरे
देता नहीं क्यूँ ज़कात इस की
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
है ख़ुशी अपनी वही जो कुछ ख़ुशी है आप की
है वही मंज़ूर जो कुछ आप को मंज़ूर हो
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
हो जाती है हवा क़फ़स-ए-तन से छट के रूह
क्या सैद भागता है रिहा हो के दाम से
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
होते होते न हुआ मिसरा-ए-रंगीं मौज़ूँ
बंद क्यूँ हो गया ख़ून-ए-जिगर आते आते
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
जला कर ज़ाहिदों को मय-कशों को शाद करते हैं
गिरा कर मस्जिदों को मय-कदे आबाद करते हैं
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
जिधर को मिरी चश्म-ए-तर जाएगी
उधर काम दरिया का कर जाएगी
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
जिस क़दर वो मुझ से बिगड़ा मैं भी बिगड़ा उस क़दर
वो हुआ जामे से बाहर मैं भी नंगा हो गया
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही

