जान देने के सिवा और भी तदबीर करूँ
वर्ना ये बात तो हम उस से सदा कहते हैं
मीर मेहदी मजरूह
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जान इंसाँ की लेने वालों में
एक है मौत दूसरा है इश्क़
मीर मेहदी मजरूह
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कज-अदाई ये सब हमीं तक थी
अब ज़माने को इंक़लाब कहाँ
मीर मेहदी मजरूह
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किसी से इश्क़ अपना क्या छुपाएँ
मोहब्बत टपकी पड़ती है नज़र से
मीर मेहदी मजरूह
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कुछ अर्ज़-ए-तमन्ना में शिकवा न सितम का था
मैं ने तो कहा क्या था और आप ने क्या जाना
मीर मेहदी मजरूह
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कुछ हो मजरूह घुस चलो घर में
आज दर उस का है खुला चौपट
मीर मेहदी मजरूह
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क्या हमारी नमाज़ क्या रोज़ा
बख़्श देने के सौ बहाने हैं
मीर मेहदी मजरूह
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