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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

सहल हो गरचे अदू को मगर उस का मिलना
इतना मैं ख़ूब समझता हूँ कि आसाँ तो नहीं

मीर मेहदी मजरूह




शग़्ल-ए-उल्फ़त को जो अहबाब बुरा कहते हैं
कुछ समझ में नहीं आता कि ये क्या कहते हैं

मीर मेहदी मजरूह




शौक़ से शौक़ है कुछ मंज़िल का
राहबर से भी बढ़े जाते हैं

मीर मेहदी मजरूह




सुना हाल-ए-दिल-ए-'मजरूह' शब को
कोई हसरत सी हसरत थी बयाँ में

मीर मेहदी मजरूह




तालिब-ए-दोस्त अलग रहते हैं सब से उन को
पास-ए-असनाम नहीं ख़्वाहिश-ए-इस्लाम नहीं

मीर मेहदी मजरूह




तरश्शोह हाँ करे जिस की नहीं पर
मिरी सौ जाँ तसद्दुक़ उस नहीं पर

मीर मेहदी मजरूह




तुम्हें गर ख़ुश-ज़बाँ होना है साहब
तो लो मुँह में ज़रा मेरी ज़बाँ को

मीर मेहदी मजरूह