क्यूँ मेरी बूद-ओ-बाश की पुर्सिश है हर घड़ी
तुम तो कहो कि रहते हो दो दो पहर कहाँ
मीर मेहदी मजरूह
क्यूँ पास मिरे आ कर यूँ बैठे हो मुँह फेरे
क्या लब तिरे मिस्री हैं मैं जिन को चबा जाता
मीर मेहदी मजरूह
मिरे किस काम का है बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता
इसे रिश्वत में दूँगा पासबाँ को
मीर मेहदी मजरूह
न तो सय्याद का खटका न ख़िज़ाँ का धड़का
हम को वो चैन क़फ़स में है कि बुस्ताँ में नहीं
मीर मेहदी मजरूह
न उस के लब को फ़क़त लाल कह के ख़त्म करो
अभी तो उस में बहुत सी है गुफ़्तुगू बाक़ी
मीर मेहदी मजरूह
नए फ़ित्ने जो उठते हैं जहाँ में
सलाहें सब ये लेते हैं तुम्हीं से
मीर मेहदी मजरूह
राल टपकेगी शैख़-साहिब की
न दिखाओ शराब की सूरत
मीर मेहदी मजरूह

