मोहब्बत तो हम ने भी की और बहुत की
मगर हुस्न को इश्क़ करना न आया
मंज़र लखनवी
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मुद्दतों बा'द कभी ऐ नज़र आने वाले
ईद का चाँद न देखा तिरी सूरत देखी
मंज़र लखनवी
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| स्वागत हे |
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मुझे मिटा के वो यूँ बैठे मुस्कुराते हैं
किसी से जैसे कोई नेक काम हो जाए
मंज़र लखनवी
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मुझे तो बख़्शिए और जीने दीजे
मुबारक आप ही को आप का दिल
मंज़र लखनवी
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न दिल में लहू है न आँखों में आँसू
ग़मों की निचोड़ी हुई आस्तीं हूँ
मंज़र लखनवी
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फिर मुँह से अरे कह कर पैमाना गिरा दीजे
फिर तोड़िए दिल मेरा फिर लीजिए अंगड़ाई
मंज़र लखनवी
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पूछने वाले भरी बज़्म में क़ातिल को न पूछ
नाम तेरा ही अगर ले लिया सौदाई ने
मंज़र लखनवी
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