कभी तो अपना समझ कर जवाब दे डालो
बदल बदल के सदाएँ पुकारता हूँ मैं
मंज़र लखनवी
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कम-सिनी क्या कम थी इस पर क़हर है शक्की मिज़ाज
अपना नावक मेरे दिल से खींच कर देखा किए
मंज़र लखनवी
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खेलना आग के शो'लों से कुछ आसान नहीं
बस ये इक बात ख़ुदा-दाद है परवाने में
मंज़र लखनवी
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कीजिए क्यूँ मुर्दा अरमानों से छेड़
सोने वालों को तो सोने दीजिए
मंज़र लखनवी
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किस का कूचा है आ गया हूँ कहाँ
याँ तो कुछ नींद आई जाती है
मंज़र लखनवी
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किसी आँख में नींद आए तो जानूँ
मिरा क़िस्सा-ए-ग़म कहानी नहीं है
मंज़र लखनवी
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कुछ अब्र को भी ज़िद है 'मंज़र' मिरी तौबा से
जब अहद किया मैं ने घनघोर घटा छाई
मंज़र लखनवी
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