माँगने पर क्या न देगा ताक़त-ए-सब्र-ओ-सुकून
जिस ने बे माँगे अता कर दी परेशानी मुझे
मंज़र लखनवी
मैं तिनके चुनता फिरता हूँ सय्याद तीलियाँ
तय्यार हो रहा है क़फ़स आशियाँ के साथ
मंज़र लखनवी
मर्ग-ए-आशिक़ पे फ़रिश्ता मौत का बदनाम था
वो हँसी रोके हुए बैठा था जिस का काम था
मंज़र लखनवी
मिरा बेड़ी पहनना था कि दुनिया की हवा बदली
ज़माने की बहारें फट पड़ीं आ के गुलिस्ताँ पर
मंज़र लखनवी
मिरी रात क्यूँ कर कटेगी इलाही
मुझे दिन को तारे नज़र आ रहे हैं
मंज़र लखनवी
मिरी रात क्यूँकर कटेगी इलाही
मुझे दिन को तारे नज़र आ रहे हैं
मंज़र लखनवी
मिटाने वाले हमारा ही घर मिटाना था
चमन में एक से एक अच्छा आशियाना था
मंज़र लखनवी

