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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

जिन सफ़ीनों ने कभी तोड़ा था मौजों का ग़ुरूर
उस जगह डूबे जहाँ दरिया में तुग़्यानी न थी

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




काश दौलत-ए-ग़म ही अपने पास बच रहती
वो भी उन को दे बैठे ऐसी मात खाई है

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




खिल उठे गुल या खिले दस्त-ए-हिनाई तेरे
हर तरफ़ तू है तो फिर तेरा पता किस से करें

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए
आईना है इसे पत्थर से न तोड़ा जाए

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




कुछ ग़म-ए-जानाँ कुछ ग़म-ए-दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम
एक ग़ज़ल मंसूब है उस से एक ग़ज़ल हालात के नाम

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




क्या जानिए कैसी थी वो हवा चौंका न शजर पत्ता न हिला
बैठा था मैं जिस के साए में 'मंज़ूर' वही दीवार गिरी

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद




न ख़ौफ़-ए-बर्क़ न ख़ौफ़-ए-शरर लगे है मुझे
ख़ुद अपने बाग़ को फूलों से डर लगे है मुझे

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद