इंसान में क्या भरा हुआ है
होंटों से दिमाग़ तक सिले हैं
माजिद-अल-बाक़री
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लोहे और पत्थर की सारी तस्वीरें मिट जाएँगी
काग़ज़ के पर्दे पर हम ने सब के रूप जमाए हैं
माजिद-अल-बाक़री
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मुझी से पूछ रहा था मिरा पता कोई
बुतों के शहर में मौजूद था ख़ुदा कोई
माजिद-अल-बाक़री
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क़रीब देख के उस को ये बात किस से कहूँ
ख़याल दिल में जो आया गुनाह जैसा था
माजिद-अल-बाक़री
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सूखे पत्ते सब इकट्ठे हो गए हैं
रास्ते में एक दीवार आ गई है
माजिद-अल-बाक़री
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आज़ादी की धूमें हैं शोहरे हैं तरक़्क़ी के
हर गाम है पस्पाई हर वज़्अ ग़ुलामाना
मजनूँ गोरखपुरी
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हिनाई हाथ से आँचल सँभाले
ये शरमाता हुआ कौन आ रहा है
मजनूँ गोरखपुरी
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