क़िस्मत अजीब खेल दिखाती चली गई
जो हँस रहे थे उन को रुलाती चली गई
लता हया
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तीरगी ख़ामुशी बेबसी तिश्नगी
हिज्र की रात में ख़ामियाँ ख़ामियाँ
लता हया
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हम झुलस तो रहे हैं ऐ जानाँ!
तेरा सूरज भी तो पिघलता है
लतीफ़ साहिल
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मैं तो चलता हूँ तेरी याद के साथ
रास्ता मेरे साथ चलता है
लतीफ़ साहिल
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एक आसेब तआक़ुब में लगा रहता है
मैं जो रुकता हूँ तो फिर उस की सदा चलती है
लियाक़त जाफ़री
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हालाँकि पहले साए से रहती थी कश्मकश
अब अपने बोझ से ही दबा जा रहा हूँ मैं
लियाक़त जाफ़री
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हम भी जी भर के तुझे कोसते फिरते लेकिन
हम तिरा लहजा-ए-बे-बाक कहाँ से लाएँ
लियाक़त जाफ़री
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