EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

साहिल से सुना करते हैं लहरों की कहानी
ये ठहरे हुए लोग बग़ावत नहीं करते

खुर्शीद अकबर




सहल क्या बार-ए-अमानत का उठाना है फ़लक
मैं सँभलता हूँ मिरे साथ सँभलती है ज़मीं

खुर्शीद अकबर




समुंदर आसमाँ इस पर सितारों का सफ़ीना
मिरा महताब-ए-ग़म है बे-करानी देखने में

खुर्शीद अकबर




शाम के तीर से ज़ख़्मी है 'ख़ुर्शीद' का सीना
नूर सिमट कर सुर्ख़ कबूतर बन जाता है

खुर्शीद अकबर




शहर बे-आब हुआ जाता है
अपनी आँखों में बचा लूँ पानी

खुर्शीद अकबर




शहर जब ख़ुद-कफ़ील है साहब
कौन किस का मलाल करता है

खुर्शीद अकबर




सिसकती आरज़ू का दर्द हूँ फ़ुटपाथ जैसा हूँ
कि मुझ में छटपटाता शहर-ए-कलकत्ता भी रहता है

खुर्शीद अकबर