तिरी निगाह तो ख़ुश-मंज़री पे रहती है
तेरी पसंद के मंज़र कहाँ से लाऊँ मैं
खलील तनवीर
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तू मुझ को भूलना चाहे तो भूल सकता है
मैं एक हर्फ़-ए-तमन्ना तिरी किताब में हूँ
खलील तनवीर
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वो लोग अपने आप में कितने अज़ीम थे
जो अपने दुश्मनों से भी नफ़रत न कर सके
खलील तनवीर
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वो लोग जिन की ज़माना हँसी उड़ाता है
इक उम्र बअ'द उन्हें मो'तबर भी करता है
खलील तनवीर
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वो शहर छोड़ के मुद्दत हुई चला भी गया
हद-ए-उफ़ुक़ पे मगर चाँद रू-ब-रू है वही
खलील तनवीर
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ज़माना लाख सितारों को छू के आ जाए
अभी दिलों को मगर हाजत-ए-रफ़ू है वही
खलील तनवीर
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ज़रा सी ठेस लगी थी कि चूर चूर हुआ
तिरे ख़याल का पैकर भी आबगीना था
खलील तनवीर
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