अब मिरी तन्हाई भी मुझ से बग़ावत कर गई
कल यहाँ जो कुछ हुआ था सब फ़साना हो गया
खालिद गनी
लकीरें पीटने वालों को 'ख़ालिद'
लकीरों पर हँसी आने लगी है
खालिद गनी
मिरे सुलूक की क़ीमत यहीं अदा कर दे
मुझे गुनाह की लज़्ज़त से आश्ना कर दे
खालिद गनी
रंग ख़ुश्बू और मौसम का बहाना हो गया
अपनी ही तस्वीर में चेहरा पुराना हो गया
खालिद गनी
बहुत हैं सज्दा-गाहें पर दर-ए-जानाँ नहीं मिलता
हज़ारों देवता हैं हर तरफ़ इंसाँ नहीं मिलता
ख़ालिद हसन क़ादिरी
घुटन तो दिल की रही क़स्र-ए-मरमरीं में भी
न रौशनी से हुआ कुछ न कुछ हवा से हुआ
ख़ालिद हसन क़ादिरी
किस से पूछें कि हम किधर जाएँ
याद अब हम को वो गली ही नहीं
ख़ालिद हसन क़ादिरी

