हर एक गाम पे रंज-ए-सफ़र उठाते हुए
मैं आ पड़ा हूँ यहाँ तुझ से दूर जाते हुए
कामी शाह
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ले उड़ा है तिरा ख़याल हमें
और हम क़ाफ़िले से निकले हैं
कामी शाह
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मैं अपने दिल की कहता हूँ
तुम अपने दिल की सुनती हो
कामी शाह
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मैं उड़ता रहता हूँ नीले समुंदरों में कहीं
सो तितलियों के लिए ख़्वाब लाता रहता हूँ
कामी शाह
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वैसे तुम अच्छी लड़की हो
लेकिन मेरी क्या लगती हो
कामी शाह
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'अजमल' सफ़र में साथ रहीं यूँ सऊबतें
जैसे कि हर सज़ा का सज़ा-वार मैं ही था
कबीर अजमल
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कहते हैं कि उठने को है अब रस्म-ए-मोहब्बत
और इस के सिवा कोई तमाशा भी नहीं है
कबीर अजमल
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