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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दीजूर की सूझी
अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी

जुरअत क़लंदर बख़्श




वाँ से आया है जवाब-ए-ख़त कोई सुनियो तो ज़रा
मैं नहीं हूँ आप मैं मुझ से न समझा जाएगा

जुरअत क़लंदर बख़्श




वाह मैं और न आने को कहूँगा तौबा
मैं तो हैराँ हूँ ये बात आप ने फ़रमाई क्या

जुरअत क़लंदर बख़्श




वारस्ता कर दिया जिसे उल्फ़त ने बस वो शख़्स
कब दाम-कुफ्र ओ रिश्ता-ए-इस्लाम में फँसा

जुरअत क़लंदर बख़्श




याँ ज़ीस्त का ख़तरा नहीं हाँ खींचिए तलवार
वो ग़ैर था जो देख के समसाम डरे था

जुरअत क़लंदर बख़्श




याद क्या आता है वो मेरा लगे जाना और आह
पीछे हट कर उस का ये कहना कोई आ जाएगा

जुरअत क़लंदर बख़्श




ये आग लगा दी कि नहीं अंजुम-ओ-अफ़्लाक
ये दाग़ पे है दाग़ ये छाले पे है छाला

जुरअत क़लंदर बख़्श