ज़ाहिद न रहने पाएँगे आबाद मय-कदे
जब तक न ढाइएगा तिरी ख़ानक़ाह को
जोशिश अज़ीमाबादी
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ज़ुल्फ़ और रुख़ की परस्तिश शर्त है
कुफ़्र हो ऐ शैख़ या इस्लाम हो
जोशिश अज़ीमाबादी
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अक्स-ए-ख़याल-ए-यार सँवारा करेंगे हम
शीशे में आइने को उतारा करेंगे हम
जुनैद अख़्तर
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मैं भला हाथ दुआओं को उठाता कैसे
उस ने छोड़ी ही नहीं कोई ज़रूरत बाक़ी
जुनैद अख़्तर
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राह-ए-तलब में दाम-ओ-दिरम छोड़ जाएँगे
लिख लो हमारे शेर बड़े काम आएँगे
जुनैद अख़्तर
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रखते हैं मोहब्बत को तग़ाफ़ुल में छुपा कर
पर्वा ही तो करते हैं जो पर्वा नहीं करते
जुनैद अख़्तर
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सारे तो नहीं जान बचाने में लगे हैं
कुछ घाव हमें ज़ख़्म लगाने में लगे हैं
जुनैद अख़्तर
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