तिरा शेर 'जोशिश' तुझे है पसंद
तू मुहताज है किस की ताईद का
जोशिश अज़ीमाबादी
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तुझ से हम-बज़्म हों नसीब कहाँ
तू कहाँ और मैं ग़रीब कहाँ
जोशिश अज़ीमाबादी
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उस के रुख़्सार पर कहाँ है ज़ुल्फ़
शोला-ए-हुस्न का धुआँ है ज़ुल्फ़
जोशिश अज़ीमाबादी
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वो माह भर के जाम-ए-मय-नाब ले गया
इक दम में आफ़्ताब को महताब ले गया
जोशिश अज़ीमाबादी
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याँ तक रहे जुदा कि हमारे मज़ाक़ में
आख़िर कि ज़हर-ए-हिज्र भी तिरयाक हो गया
जोशिश अज़ीमाबादी
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ये सच है कि औरों ही को तुम याद करोगे
मेरे दिल-ए-नाशाद को कब शाद करोगे
जोशिश अज़ीमाबादी
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ये ज़ीस्त तर्फ़-ए-दिल ही में या-रब तमाम हो
काफ़िर हूँ गर इरादा-ए-बैत-उल-हराम हो
जोशिश अज़ीमाबादी
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