तू न हो ये तो हो नहीं सकता
मेरा क्या था हुआ हुआ न हुआ
इस्माइल मेरठी
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उल्टी हर एक रस्म-ए-जहान-ए-शुऊर है
सीधी सी इक ग़ज़ल मुझे लिखनी ज़रूर है
इस्माइल मेरठी
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उसी का वस्फ़ है मक़्सूद शेर-ख़्वानी से
उसी का ज़िक्र है मंशा ग़ज़ल-सराई का
इस्माइल मेरठी
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उठा हिजाब तो बस दीन-ओ-दिल दिए ही बनी
जनाब-ए-शैख़ को दावा था पारसाई का
इस्माइल मेरठी
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वाँ सज्दा-ए-नियाज़ की मिट्टी ख़राब है
जब तक कि आब-ए-दीदा से ताज़ा वज़ू न हो
इस्माइल मेरठी
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या वफ़ा ही न थी ज़माने में
या मगर दोस्तों ने की ही नहीं
इस्माइल मेरठी
यारान-ए-बज़्म-दहर में क्या क्या तपाक था
लेकिन जब उठ गए तो न बार-ए-दिगर मिले
इस्माइल मेरठी
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