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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

एक ही शय थी ब-अंदाज़-ए-दिगर माँगी थी
मैं ने बीनाई नहीं तुझ से नज़र माँगी थी

इज़हार असर




तारीकियों के पार चमकती है कोई शय
शायद मिरे जुनून-ए-सफ़र की उमंग है

इज़हार असर




तमाम मज़हर-ए-फ़ितरत तिरे ग़ज़ल-ख़्वाँ हैं
ये चाँदनी भी तिरे जिस्म का क़सीदा है

इज़हार असर




तू भी तो हटा जिस्म के सूरज से अंधेरे
ये महकी हुई रात भी महताब-ब-कफ़ है

इज़हार असर




उन से मिलने का मंज़र भी दिल-चस्प था ऐ 'असर'
इस तरफ़ से बहारें चलीं और उधर से खिज़ाएँ चलीं

इज़हार असर




आँखें जो उठाए तो मोहब्बत का गुमाँ हो
नज़रों को झुकाए तो शिकायत सी लगे है

जाँ निसार अख़्तर




आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

जाँ निसार अख़्तर