क्या ख़बर कब बरस के टूट पड़े
हर तरफ़ ऐसी है घटा छाई
इंद्र सराज़ी
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क्या ख़बर क्या ख़ता मिरी थी कि जो
मुझ से रूठा रहा ख़ुदा मेरा
इंद्र सराज़ी
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राज़-दाँ होते हैं वो घर अक्सर
जिन घरों में धुआँ नहीं होता
इंद्र सराज़ी
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सावन की इस रिम-झिम में
भीग रहा है तन्हा चाँद
इंद्र सराज़ी
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ये शफ़क़ चाँद सितारे नहीं अच्छे लगते
तुम नहीं हो तो नज़ारे नहीं अच्छे लगते
इन्दिरा वर्मा
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अजीब लुत्फ़ कुछ आपस के छेड़-छाड़ में है
कहाँ मिलाप में वो बात जो बिगाड़ में है
इंशा अल्लाह ख़ान
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बैठता है जब तुंदीला शैख़ आ कर बज़्म में
इक बड़ा मटका सा रहता है शिकम आगे धरा
इंशा अल्लाह ख़ान
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