सारे क़ुरआन से उस परी-रू को
याद इक लफ़्ज़-ए-लन-तरानी है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
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सख़्त है हैरत हमें जो ज़ेर-ए-अबरू ख़ाल है
हम तो सुनते थे कि का'बे में कोई हिन्दू नहीं
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
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ठुकरा के चले जबीं को मेरी
क़िस्मत की लिखी ने यावरी की
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
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वो तिफ़्ल-ए-नुसैरी आए शायद
क़स्में दूँ मुर्तज़ा-अली की
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
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ज़ाहिदो क़ुदरत-ए-ख़ुदा देखो
बुत को भी दावा-ए-ख़ुदाई है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
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ज़ोफ़ से रहता है अब पाँव पे सर
आप-अपनी ठोकरें खाते हैं हम
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
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आईना-ख़ाने से दामन को बचा कर गुज़रो
आईना टूटा तो रेज़ों में बिखर जाओगे
गुलाम जीलानी असग़र
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