दर पे नालाँ जो हूँ तो कहता है
पूछो क्या चीज़ बेचता है ये
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
दिमाग़ और ही पाती हैं इन हसीनों में
ये माह वो हैं नज़र आएँ जो महीनों में
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
गर हमारे क़त्ल के मज़मूँ का वो नामा लिखे
बैज़ा-ए-फ़ौलाद से निकलें कबूतर सैकड़ों
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
गया है कूचा-ए-काकुल में अब दिल
मुसलमाँ वारिद-ए-हिन्दोस्ताँ है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
हर गाम पे ही साए से इक मिस्रा-ए-मौज़ूँ
गर चंद क़दम चलिए तो क्या ख़ूब ग़ज़ल हो
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
इत्र मिट्टी का लगाया चाहिए पोशाक में
ख़ाक से रग़बत रहे मिलना है इक दिन ख़ाक में
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
जामा-ए-सुर्ख़ तिरा देख के गुल
पैरहन अपना क़बा करते हैं
गोया फ़क़ीर मोहम्मद

