रात को ख़्वाब बहुत देखे हैं
आज ग़म कल से ज़रा हल्का है
फ़ज़्ल ताबिश
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सुनते हैं कि इन राहों में मजनूँ और फ़रहाद लुटे
लेकिन अब आधे रस्ते से लौट के वापस जाए कौन
फ़ज़्ल ताबिश
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सूरज ऊँचा हो कर मेरे आँगन में भी आया है
पहले नीचा था तो ऊँचे मीनारों पर बैठा था
फ़ज़्ल ताबिश
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वही दो-चार चेहरे अजनबी से
उन्हीं को फिर से दोहराना पड़ेगा
फ़ज़्ल ताबिश
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ये बस्ती कब दरिंदों से थी ख़ाली
मैं फिर भी ठीक लोगों में रहा हूँ
फ़ज़्ल ताबिश
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ये सूरज क्यूँ भटकता फिर रहा है
मिरे अंदर उतर जाता तो सोता
फ़ज़्ल ताबिश
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आदाब-ए-आशिक़ी से तो हम बे-ख़बर न थे
दीवाने थे ज़रूर मगर इस क़दर न थे
फ़िगार उन्नावी
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