है सख़्त मुश्किल में जान साक़ी पिलाए आख़िर किधर से पहले
सभी की आँखें ये कह रही हैं इधर से पहले इधर से पहले
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
हमारे उन के तअल्लुक़ का अब ये आलम है
कि दोस्ती का है क्या ज़िक्र दुश्मनी भी नहीं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
नक़ाब उन ने रुख़ से उठाई तो लेकिन
हिजाबात कुछ दरमियाँ और भी हैं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
हर इक शय ख़ून में डूबी हुई है
कोई इस तरह से पैदा न होता
फ़ज़्ल ताबिश
कमरे में आ के बैठ गई धूप मेज़ पर
बच्चों ने खिलखिला के मुझे भी जगा दिया
फ़ज़्ल ताबिश
माँगने से हुआ है वो ख़ुद-सर
कुछ दिनों कुछ न माँग कर देखो
फ़ज़्ल ताबिश
न कर शुमार कि हर शय गिनी नहीं जाती
ये ज़िंदगी है हिसाबों से जी नहीं जाती
फ़ज़्ल ताबिश

