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इक़बाल अज़ीम शायरी | शाही शायरी

इक़बाल अज़ीम शेर

21 शेर

जुनूँ को होश कहाँ एहतिमाम-ए-ग़ारत का
फ़साद जो भी जहाँ में हुआ ख़िरद से हुआ

इक़बाल अज़ीम




जिस में न कोई रंग न आहंग न ख़ुशबू
तुम ऐसे गुलिस्ताँ को जला क्यूँ नहीं देते

इक़बाल अज़ीम




आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब
ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे

इक़बाल अज़ीम




जब घर की आग बुझी तो कुछ सामान बचा था जलने से
सो वो भी उन के हाथ लगा जो आग बुझाने आए थे

इक़बाल अज़ीम




इस जश्न-ए-चराग़ाँ से तो बेहतर थे अँधेरे
इन झूटे चराग़ों को बुझा क्यूँ नहीं देते

इक़बाल अज़ीम




हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते
अब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते

इक़बाल अज़ीम




हाथ फैलाऊँ मैं ईसा-नफ़सों के आगे
दर्द पहलू में मिरे है मगर इतना भी नहीं

इक़बाल अज़ीम




बे-नियाज़ाना गुज़र जाए गुज़रने वाला
मेरे पिंदार को अब शौक़-ए-तमाशा भी नहीं

इक़बाल अज़ीम




बारहा उन से न मिलने की क़सम खाता हूँ मैं
और फिर ये बात क़स्दन भूल भी जाता हूँ मैं

इक़बाल अज़ीम