सताया आज मुनासिब जगह पे बारिश ने
इसी बहाने ठहर जाएँ उस का घर है यहाँ
इक़बाल अशहर
आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखा
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई
इक़बाल अशहर
प्यास दरिया की निगाहों से छुपा रक्खी है
एक बादल से बड़ी आस लगा रक्खी है
इक़बाल अशहर
फिर तिरा ज़िक्र किया बाद-ए-सबा ने मुझ से
फिर मिरे दिल को धड़कने के बहाने आए
इक़बाल अशहर
न जाने कितने चराग़ों को मिल गई शोहरत
इक आफ़्ताब के बे-वक़्त डूब जाने से
इक़बाल अशहर
मुद्दतों ब'अद मयस्सर हुआ माँ का आँचल
मुद्दतों ब'अद हमें नींद सुहानी आई
इक़बाल अशहर
ले गईं दूर बहुत दूर हवाएँ जिस को
वही बादल था मिरी प्यास बुझाने वाला
इक़बाल अशहर
किसी को खो के पा लिया किसी को पा के खो दिया
न इंतिहा ख़ुशी की है न इंतिहा मलाल की
इक़बाल अशहर
जो उस के होंटों की जुम्बिश में क़ैद था 'अशहर'
वो एक लफ़्ज़ बना बोझ मेरे शानों का
इक़बाल अशहर

