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हक़ीर शायरी | शाही शायरी

हक़ीर शेर

22 शेर

की किसी पर न जफ़ा मेरे बा'द
ख़ूब रोए वो सुना मेरे बा'द

हक़ीर




ख़ूब मिल कर गले से रो लेना
इस से दिल की सफ़ाई होती है

हक़ीर




ब-ख़ुदा सज्दे करेगा वो बिठा कर बुत को
अब 'हक़ीर' आगे मुसलमान रहे या न रहे

हक़ीर




जब से कुछ क़ाबू है अपना काकुल-ए-ख़मदार पर
साँप हर दम लोटता है सीना-ए-अग़्यार पर

हक़ीर




जानता उस को हूँ दवा की तरह
चाहता उस को हूँ शिफ़ा की तरह

हक़ीर




इश्क़ के फंदे से बचिए ऐ 'हक़ीर'-ए-ख़स्ता-दिल
इस का है आग़ाज़ शीरीं और है अंजाम तल्ख़

हक़ीर




हक़ारत की निगाहों से न फ़र्श-ए-ख़ाक को देखो
अमीरों का फ़क़ीरों का यही आख़िर को बिस्तर है

हक़ीर




देखा बग़ौर ऐब से ख़ाली नहीं कोई
बज़्म-ए-जहाँ में सब हैं ख़ुदा के सँवारे लोग

हक़ीर




छा गई एक मुसीबत की घटा चार तरफ़
खुले बालों जो वो दरिया से नहा कर निकले

हक़ीर