हम से वहशी नहीं होने के गिरफ़्तार कभी
लोग दीवाने हैं ज़ंजीर लिए फिरते हैं
मज़ाक़ बदायुनी
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निकल गया मिरी आँखों से मिस्ल-ए-ख़्वाब-व-ख़याल
गुज़र गया दिल-ए-रौशन से वो नज़र बन कर
मज़ाक़ बदायुनी
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सात आसमाँ की सैर है पर्दों में आँख के
आँखें खुलीं तो तुर्फ़ा तमाशा नज़र पड़ा
मज़ाक़ बदायुनी
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वाइज़ बुतों के आगे न फ़ुरक़ाँ निकालिए
सूरत से उन की मअ'नी-ए-क़ुरआँ निकालिए
मज़ाक़ बदायुनी
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ज़बाँ पर आह रही लब से लब कभू न मिला
तिरी तलब तो मिली क्या हुआ जो तू न मिला
मज़ाक़ बदायुनी
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