न जाने कैसा समुंदर है इश्क़ का जिस में
किसी को देखा नहीं डूब के उभरते हुए
फ़राग़ रोहवी
नफ़रत के संसार में खेलें अब ये खेल
इक इक इंसाँ जोड़ के बन जाएँ हम रेल
फ़राग़ रोहवी
सुना है अम्न-परस्तों का वो इलाक़ा है
वहीं शिकार कबूतर हुआ तो कैसे हुआ
फ़राग़ रोहवी
तुम्हारा चेहरा तुम्हें हू-ब-हू दिखाऊँगा
मैं आइना हूँ मिरा ए'तिबार तुम भी करो
फ़राग़ रोहवी
उसी तरफ़ है ज़माना भी आज महव-ए-सफ़र
'फ़राग़' मैं ने जिधर से गुज़रना चाहा था
फ़राग़ रोहवी
यारो हुदूद-ए-ग़म से गुज़रने लगा हूँ मैं
मुझ को समेट लो कि बिखरने लगा हूँ मैं
फ़राग़ रोहवी
ज़रा सी बात पे क्या क्या न खो दिया मैं ने
जो तुम ने खोया है उस का शुमार तुम भी करो
फ़राग़ रोहवी

