ऐन-फ़ितरत है कि जिस शाख़ पे फल आएँगे
इंकिसारी से वही शाख़ लचक जाएगी
दिवाकर राही
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बात हक़ है तो फिर क़ुबूल करो
ये न देखो कि कौन कहता है
दिवाकर राही
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बहुत आसान है दो घूँट पी लेना तो ऐ 'राही'
बड़ी मुश्किल से आते हैं मगर आदाब-ए-मय-ख़ाना
दिवाकर राही
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ग़ुस्से में बरहमी में ग़ज़ब में इताब में
ख़ुद आ गए हैं वो मिरे ख़त के जवाब में
दिवाकर राही
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इस दौर-ए-तरक़्क़ी के अंदाज़ निराले हैं
ज़ेहनों में अँधेरे हैं सड़कों पे उजाले हैं
दिवाकर राही
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इस इंतिज़ार में बैठे हैं उन की महफ़िल में
कि वो निगाह उठाएँ तो हम सलाम करें
दिवाकर राही
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इस से पहले कि लोग पहचानें
ख़ुद को पहचान लो तो बेहतर है
दिवाकर राही
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