पढ़े जाओ 'बेख़ुद' ग़ज़ल पर ग़ज़ल
वो बुत बन गए हैं सुने जाएँगे
बेख़ुद देहलवी
क़यामत है तिरी उठती जवानी
ग़ज़ब ढाने लगीं नीची निगाहें
बेख़ुद देहलवी
राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझे
आदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद
बेख़ुद देहलवी
रक़ीबों के लिए अच्छा ठिकाना हो गया पैदा
ख़ुदा आबाद रखे मैं तो कहता हूँ जहन्नम को
बेख़ुद देहलवी
रिंद-मशरब कोई 'बेख़ुद' सा न होगा वल्लाह
पी के मस्जिद ही में ये ख़ाना-ख़राब आता है
बेख़ुद देहलवी
सख़्त-जाँ हूँ मुझे इक वार से क्या होता है
ऐसी चोटें कोई दो-चार तो आने दीजे
बेख़ुद देहलवी
सौदा-ए-इश्क़ और है वहशत कुछ और शय
मजनूँ का कोई दोस्त फ़साना-निगार था
बेख़ुद देहलवी

