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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

इक नवा-ए-रफ़्ता की बाज़गश्त थी 'क़ैसी'
दिल जिसे समझते थे दश्त-ए-बे-सदा निकला

अज़ीज़ क़ैसी




जितने थे रंग हुस्न-ए-बयाँ के बिगड़ गए
लफ़्ज़ों के बाग़ शहर की सूरत उजड़ गए

अज़ीज़ क़ैसी




जो ज़ख़्म दोस्तों ने दिए हैं वो छुप तो जाएँ
पर दुश्मनों की सम्त से पत्थर कोई तो आए

अज़ीज़ क़ैसी




कई बार दौर-ए-कसाद में गिरे मेहर-ओ-माह के दाम भी
मगर एक क़ीमत-ए-जिंस-ए-दिल जो खरी रही तो खरी रही

अज़ीज़ क़ैसी




क्या हाथ उठाइए दुआ को
हम हाथ उठा चुके दुआ से

अज़ीज़ क़ैसी




नज़र उठाओ तो झूम जाएँ नज़र झुकाओ तो डगमगाएँ
तुम्हारी नज़रों से सीखते हैं तरीक़ मौत-ओ-हयात के हम

अज़ीज़ क़ैसी




तुझे सीने से लगा लूँ तुझे दिल में रख लूँ
दर्द की छाँव में ज़ख़्मों की अमाँ में आ जा

अज़ीज़ क़ैसी