तमाम शहर को तारीकियों से शिकवा है
मगर चराग़ की बैअत से ख़ौफ़ आता है
अज़ीज़ नबील
वो एक राज़! जो मुद्दत से राज़ था ही नहीं
उस एक राज़ से पर्दा उठा दिया गया है
अज़ीज़ नबील
आह-ए-बे-असर निकली नाला ना-रसा निकला
इक ख़ुदा पे तकिया था वो भी आप का निकला
अज़ीज़ क़ैसी
अब तो फ़क़त बदन की मुरव्वत है दरमियाँ
था रब्त-ए-जान-ओ-दिल तो शुरूआ'त ही में था
अज़ीज़ क़ैसी
अजीब शहर है घर भी हैं रास्तों की तरह
किसे नसीब है रातों को छुप के रोना भी
अज़ीज़ क़ैसी
चल 'क़ैसी' मेले में चल क्या रोना तन्हाई का
कोई नहीं जब तेरा मेरा सब मेरे सब तेरे
अज़ीज़ क़ैसी
दिलों का ख़ूँ करो सालिम रखो गरेबाँ को
जुनूँ की रस्म ज़माना हुआ उठा दी है
अज़ीज़ क़ैसी

