इश्क़ में ये तफ़रक़ा-बाज़ी बहुत मायूब है
प्यार को शीआ वहाबी और सुन्नी मत समझ
अज़ीज़ फ़ैसल
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कितनी मज़ाहिया है ये बोतल के जिन की बात
आक़ा अब इंक़लाब है दो चार दिन की बात
अज़ीज़ फ़ैसल
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कूदे हैं उस के सेहन में दो-चार शेर-दिल
हम फेसबुक की वाल से आगे नहीं गए
अज़ीज़ फ़ैसल
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मैं एक बोरी में लाया हूँ भर के मूँग-फली
किसी के साथ दिसम्बर की रात काटनी है
अज़ीज़ फ़ैसल
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मोअर्रिख़ लिख न दें सुक़रात मुझ को
मैं लस्सी का पियाला पी रहा हूँ
अज़ीज़ फ़ैसल
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न ये क़ानून काम आया था राँझे के ज़रा सा भी
उसी को भैंस मिलती है हो जिस के हाथ में लाठी
अज़ीज़ फ़ैसल
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थका हारा निकल कर घर से अपने
वो पीर ऑफ़िस में सोने जा चुका है
अज़ीज़ फ़ैसल
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