जिस क़दर नफ़रत बढ़ाई उतनी ही क़ुर्बत बढ़ी
अब जो महफ़िल में नहीं है वो तुम्हारे दिल में है
आरज़ू लखनवी
जितने हुस्न-आबाद में पहोंचे होश-ओ-ख़िरद खो कर पहोंचे
माल भी तो उतने का नहीं अब जितना कुछ महसूल पड़ा
आरज़ू लखनवी
जो दिल रखते हैं सीने में वो काफ़िर हो नहीं सकते
मोहब्बत दीन होती है वफ़ा ईमान होती है
आरज़ू लखनवी
जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के
अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं
आरज़ू लखनवी
जोश-ए-जुनूँ में वो तिरे वहशी का चीख़ना
बंद अपने हाथ से दर-ए-ज़िंदाँ किए हुए
आरज़ू लखनवी
कह के ये और कुछ कहा न गया
कि मुझे आप से शिकायत है
आरज़ू लखनवी
कम जो ठहरे जफ़ा से मेरी वफ़ा
तो ये पासंग है तराज़ू का
आरज़ू लखनवी

