डूबे हुए तारों पे मैं क्या अश्क बहाता
चढ़ते हुए सूरज से मिरी आँख लड़ी थी
अनवर मसूद
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हाँ मुझे उर्दू है पंजाबी से भी बढ़ कर अज़ीज़
शुक्र है 'अनवर' मिरी सोचें इलाक़ाई नहीं
अनवर मसूद
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हमें क़रीना-ए-रंजिश कहाँ मयस्सर है
हम अपने बस में जो होते तिरा गिला करते
अनवर मसूद
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इधर से लिया कुछ उधर से लिया
यूँही चल रहे हैं इदारे तिरे
अनवर मसूद
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इस वक़्त वहाँ कौन धुआँ देखने जाए
अख़बार में पढ़ लेंगे कहाँ आग लगी थी
अनवर मसूद
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जाने किस रंग से रूठेगी तबीअत उस की
जाने किस ढंग से अब उस को मनाना होगा
अनवर मसूद
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जो हँसना हँसाना होता है
रोने को छुपाना होता है
अनवर मसूद
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