बरहमन दैर से काबे से फिर आए हाजी
तेरे दर से न सरकना था न सरके आशिक़
अमीर मीनाई
बोसा लिया जो उस लब-ए-शीरीं का मर गए
दी जान हम ने चश्मा-ए-आब-ए-हयात पर
अमीर मीनाई
छेड़ देखो मिरी मय्यत पे जो आए तो कहा
तुम वफ़ादारों में हो या मैं वफ़ादारों में हूँ
अमीर मीनाई
देख ले बुलबुल ओ परवाना की बेताबी को
हिज्र अच्छा न हसीनों का विसाल अच्छा है
अमीर मीनाई
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा
कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया उधर रक्खा
अमीर मीनाई
फ़ुर्क़त में मुँह लपेटे मैं इस तरह पड़ा हूँ
जिस तरह कोई मुर्दा लिपटा हुआ कफ़न में
अमीर मीनाई
गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है 'अमीर'
क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना
अमीर मीनाई

